Tuesday, February 9, 2016

A POEM

                                                             अपनेपन की तलाश

अपनेपन की तलाश  में
मैं अपनो को ही खो बैठी
कुछ रिश्ते तो थे नाम के
अब उनसे भी हाथ धो बैठी
सब रिश्ते मतलब के हैं
किस किस का जिक्र करु
हर रिश्ता एक समझोता है
किस किस की फिक्र करें
रिश्ते रहें या टूट जाएं
किस पर असर पडता है
यह रिश्ते इक दिखावा ही हैं
कब नकाब उतर जाए
क्या पता लगता है
रिश्तो की अहमियत को पहचानिए
इन्हे इतना भी सस्ता न जानिए
अगर यह रिश्ते टूट गए
तो टूट जाएगे हम
फिर इन रिश्तो की कमी को
नही मिटा पाएगें हम
रिश्तो को धोखे और
फेरेब से मत सींचिए
इन्हे विश्वास के आंचल
तले पनपने दीजिए
फिर जीने का देखिए
कितना मजा आएगा
हर पल होने वाले
रिश्ते के दर्द से

छटकारा मिल जाएगा  ।

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